Saturday, 14 May 2011

पानी पर नीतीश का 'जजिया कर'

विपक्ष विहीन बिहार में मिस्‍टर सुशासन उर्फ मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार की
जनविरोधी नीतियां अब एक-एक कर जनता के सामने आने लगी हैं। पहले बिजली के
बाजारीकरण का खेल शुरू हुआ। खेल खत्‍म होने से पहले ही पानी के बाजारीकरण
का खेल भी शुरू हो गया है। पक्‍की खबर है कि सूबे में अब लोगों को अपनी
जमीन से पीने के लिए पानी निकालने पर नीतीश सरकार को 'जजिया कर' (टैक्‍स)
 देना होगा। यही नहीं जो जितना अधिक पानी यूज करेगा उसे उतना ही अधिक
टैक्‍स देना होगा। यानी पानी अब पराया गया है। जल पर जन का अधिकार नहीं
होगा। वैसे मिस्‍टर सुशासन का तर्क है कि इससे भू-जल की बर्बादी
नियंत्रित होगी। सूबे के सभी नगर निगमों  और पंचायती राज संस्‍थाओं  के
पास इस बाबत तुगलकी फरमान भेज दिए गए हैं। कई जगह अखबार वालों ने 'गुड
न्‍यूज' 'खास खबर' और जल संरक्षण  की दिशा में राज्‍य सरकार द्वारा उठाए
गए एक महत्‍वपूर्ण कदम जैसे भाव के साथ इस खबर को परोसा है। सूबे के किसी
भी अखबार ने इसे जनविरोधी बताने की जुर्रत नहीं की है।

पहले ही बन गई थी रणनीति
करीब दो साल पहले बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार की सरकार ने इस विधेयक
को पास कराया था। तब किसी भी विपक्षी दल (राजद-लोजपा-वामदल) या विधायकों
ने विरोध नहीं जताया था। अखबारों में भी छोटी-छोटी खबरें प्रकाशित हुई
थीं। दरअसल, यह विधेयक कितना जनविरोधी है उस समय कोई ठीक से समझ ही नहीं
पाया। और भला समझता भी कैसे ?  उसके लिए दिमाग जो चाहिए। खैर, बिहार में
अक्‍सर ऐसा होता आया है कि विधेयक पारित होते समय विधानमंडल में कोई
प्रतिरोध नहीं होता। जब विधेयक लागू होने की बारी आती है तो जनता और
पार्टियां सड़क पर उतरने लगती हैं। शायद इस बार भी ऐसा ही होता, लेकिन
आसार नहीं दिख रहे हैं। क्‍योंकि इस बार तो विपक्ष सिरे से ही गायब है।
आखिर मुंह खोलेगा कौन ? मीडिया से तो उम्‍मीद ही बेमानी है। वह तो
मुख्‍यमंत्री के मुखपत्र की भूमिका निभा रहा है। मुझे अच्‍छी तरह याद है
जब विधेयक पास हुआ था तो मैंने मुजफ्फरपुर में भाकपा माले के कुछ साथियों
से विरोध जताने की अपील की थी, लेकिन उन्‍होंने भी गंभीरता से नहीं लिया।

किसने दिखाई नीतीश को राह
यों तो देश में पानी के बाजारीकरण का खेल वर्ष 1990-91 में नई
अर्थव्‍यवस्‍था को अपनाने के साथ ही शुरू हो गई थी। लेकिन बिहार में यह
नीतीश कुमार के शासनकाल से दिखाई दे रहा है। मुख्‍यमंत्री बनने के बाद
नीतीश कुमार कुमार वर्ल्‍ड बैंक के एजेंट की भूमिका निभाने लगे हैं। ठीक
उसी तरह जैसे आंध्र प्रदेश में कभी चंद्रबाबू नायडू निभाया करते थे।
उन्‍होंने भी अपने यहां भू-जल पर टैक्‍स लगा रखा है। ऐसे में भला नीतीश
कुमार पीछे कैसे रह सकते थे। इन्‍होंने भी आंध्र प्रदेश का माडल बिहार
में चुपके चुपके लांच कर दिया।

क्‍यों जरूरी है विरोध
नीतीश कुमार के विकास का माडल हर तरह से वर्ल्‍ड बैंक को मालदार बनाने
वाला है। पूंजीपतियों व  विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाला है। आम
आदमी  को इससे कोई फायदा नहीं होगा। करीब 20-25 वर्षों के बाद बिहार का
हर आदमी अप्रत्‍यक्ष रूप से वर्ल्‍ड बैंक को कर्जा चुकाते नजर आएगा। इतना
ही नहीं सूबे के गरीब और गरीब हो जायेंगे। बुनियादी संसाधनों पर से उनका
हक धीरे-धीरे छिन जाएगा। जल, जंगल और जमीन जैसी जन-जायदाद पर वर्ल्‍ड
बैंक गिद्ध की तरह नजर गड़ाए हुए है। अगर नीतीश जैसे एजेंटों का विरोध
नहीं हुआ तो देश गुलाम हो जाएगा।

- एम. अखलाक
लेखक ब्‍लाग - http://www.reportaaz.blogspot.com/

1 comment:

  1. NICE APPROACH.
    Actually on occasions the meaning of the Democracy ceases to no means.
    Sans opposition, Sans media, does Bihar means only Nitish Kumar. If Development means so much the Britishers were also making remarkable development. Our freedom and Democracy is our 'Dharohar'. The achievement at the cost of these duo is intolerable.
    Though u have asked for a mild depiction, I want to add an information. A fortnight before a Correspondent for one of the leading Hindi Daily of India from Banka was assaulted and beaten up by the guards of the District Magistrate . The reporter have said to entered into the confidential chamber of D.M . Two Grade four staffs were suspended. The newpapers kept mum. A few questions remain unanswered
    The Bureaucracy of Nitish Govt. is above democracy ?
    The growing numbers of Media houses and the reporters have lost their status.?
    Sans opposition, Sans media where the democracy is ?
    Who and what situation is responsible.?
    ANG BHARAT is very soon coming into the market. keep waiting for the entire brief flash, not for the reporter but for the sake of two poor employees who were suspended.
    Himanshu

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